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नौकरानी की घमासान गांड चुदाई की कहानी Free Sex Kahani

नौकरानी की घमासान गांड चुदाई की कहानी Free Sex Kahani

हाय, मेरा नाम राज है. मैं अपनी Free Sex Kahani बताने जा रहा हूँ कि किन परिस्थितियों में मैंने उसे चोदा.

आगे बढ़ने से पहले एक बार बता दूँ कि मेरी बीवी का नाम रचना है और नौकरानी का नाम शांता है.

वो दोनों ही दिखने में आइटम हैं.

दोनों में फर्क बस इतना है कि रचना शांता से ज्यादा सुंदर है.

पर इसका मतलब ये नहीं कि शांता सुंदर नहीं है. वो भी बहुत हॉट है.

शांता के मम्मों का और गांड का आकार रचना से बड़ा है. शांता की फिगर 36-26-42 की है और मेरी बीवी रचना की फिगर 34-26-38 की है.

आज मैं शांता की चुदाई की कहानी आपके सामने पेश करने जा रहा हूँ.

रचना जॉब करती है इसलिए कभी कभी उसे मुम्बई से बाहर जाना पड़ता है.

मेरी बीवी ने पिछले एक साल से व्रत रखा था कि जब तक उसको सबसे बेस्ट एम्प्लोयी का सम्मान प्राप्त नहीं होगा तब तक वो चुदाई नहीं करेगी.

मैं उसके इस व्रत से परेशान था.

मतलब यार … ऐसा भी कोई व्रत रखा जाता है क्या कि चुदाई नहीं करूंगी.

अरे तू भले मजा न ले, मगर आदमी के लंड का तो ख्याल रखना चाहिए.

इसी लिए मैं उस पर बहुत गुस्सा हुआ था.

मैंने काफी बार उसके व्रत को तुड़वाने की कोशिश की पर मैं हर बार विफल हो गया था.

पूरे एक साल दो महीने के इस अंतराल में मैंने उसे चोदा नहीं था.

इतने लंबे देर के बाद उसे वो सम्मान प्राप्त होने जा रहा था पर इसके लिए उसे दिल्ली जाना था.

मैंने कहा- अब तो चुदाई कर लेते हैं.

वो बोली- मेरी जान, बस कुछ दिन की बात है, जहां इतना दिन सहा है, थोड़े दिन और निकालो. मैं जब दिल्ली से आऊंगी, तब पूरे दिन मैं आपके सामने नंगी रहूंगी. फिर जो चाहे वो कर लेना.

“बेबी मुझसे अब सहा नहीं जा रहा है. मैं मुठ मार रहा हूँ, फिर भी मेरा रस नहीं निकल रहा है. प्लीज एक बार चुद लो.”

रचना नीचे बैठी, उसने मेरे पैंट के ऊपर से ही मेरे लंड को किस किया और बोली- मेरे मिठ्ठू राजा … बस चार दिन और इंतज़ार करो. मैं कल जाउंगी और तीन दिन बाद आ जाऊंगी, तब तुमको अपनी प्यासी मैना के साथ जितना खेलना है, खेल लेना. बस 4 दिन अपने मालिक को परेशान मत करना.

उसके इन शब्दों से मेरा लंड पूरा खड़ा हो गया था- रचना जान, ये देखो फिर से खड़ा हो गया है. प्लीज अब तो रहम कर दो इस पर!

पर उसने मेरी एक न सुनी.

रचना ने मुझे बाजार में सब्जी लाने के लिए भेज दिया.

मैं काफी गुस्से में घर से बाहर निकला.

मेरी हालत दिन ब दिन बिना चुदाई के खराब होती जा रही थी.

मैं बेचैन हो गया था.

लंड हिलाने पर भी उसमें से पिचकारी नहीं निकल रही थी.

मैं सोच रहा था कि किसी रंडी को चोद लूँ … पर मुझे रंडियां चोदना पसंद नहीं है.

किसी भाभी को पटाने में बहुत दिन लगेंगे और उतना सब्र मुझ में नहीं था.

अब मेरे पास एक ही मार्ग बचा था कि मैं अपनी नौकरानी शांता को चोद लूँ.

उसे मैंने पिछले 4 साल से चोदा नहीं था पर वो भी एक महीने से गांव गयी थी.

ये 4 दिन कैसे कटेंगे, मुझे नहीं पता था.

जब रचना आएगी, तब तक तो मैं पागल हो जाऊंगा.

लंड का क्या करूं मुझे समझ नहीं आ रहा था.

मैंने बाजार से सब्जी खरीदी. उस दुकानदार को कितने पैसे दिए, ये भी पता नहीं चला और कौन सी सब्जी ले रहा हूँ, उस पर भी ध्यान नहीं था.

तभी एक ऑटो में शांता जैसी औरत जाती हुई दिखी.

मैं उसका पीछा करने लगा पर वो बहुत दूर निकल गयी थी.

मैंने ठीक से देखा भी नहीं था कि वो शांता है या कोई और, पर मुझे थोड़ा सुकून मिल गया था.

मैं घर आया और रचना को झट से सब्जी देकर शांता के घर के लिए निकल पड़ा.

“जानू कहां जा रहे हो?”

रचना ने पूछा भी मगर मैंने गुस्से में उसे सही जवाब नहीं दिया.

अविनाश जो कि मेरा मित्र है, मैंने उसके घर का नाम बताया और झट से निकल गया.

मैं शांता के घर के बाहर पहुंचा तो उसके घर का दरवाजा खुला था. मैं बहुत खुश हुआ और मन ही मन में लड्डू फूटने लगे.

मैंने उसके घर के बाहर जाकर उसे आवाज दी.

शांता बाहर आयी, वो खुशी से और चौंक कर बोली- अरे साहब आप और यहां?

मैं उसके जिस्म को ही घूर रहा था.

इतने दिन बाद उसे देख रहा था.

शांता ने जोर से आवाज दी- साहब कहां खो गए आप?

मैंने पूछा- हां, शांता तू कब आयी?

“साहब, मैं कल रात को ही आयी हूँ. मैं आपको यही बताने के लिए फ़ोन कर रही थी, पर आपका और मेमसाहब का फ़ोन नहीं लग रहा था. आप बैठिये, मैं आपके लिए पानी लेकर आती हूँ.”

उसकी गांड देख कर मुझसे रहा नहीं गया.

मैंने पीछे से ही उसके मम्मे कसके पकड़े और उसकी कान व गर्दन को चूमने लगा.

“साहब य…ये क्या कर रहे हो … रुको न.” उसने धक्का देकर मुझे दूर धकेला.

पर मैं उसको चोदने के लिए पागल सा हो गया था. उसका जिस्म देख कर मुझे सिर्फ चुदाई दिख रही थी.

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या कर रहा हूँ. एकदम पागल सा हो गया था.

फिर से मैंने उसको आगे से बांहों में लिया और गांड को दबाने लगा, उसके होंठों को काटने लगा.

पर उसने फिर से मुझे दूर धकेला- साहब रुकिए, ऐसा मत कीजिये यहां पर … बस्ती वालों ने देख लिया, तो हंगामा हो जाएगा. आप यहां से जाइए.

मैंने फिर से उसे पकड़ने की कोशिश की पर उसने फिर से मुझे धकेल दिया- साहब, आप पागल हो गए हो क्या?

“शांता प्लीज मुझे चोदने दो प्लीज मुझे चोदने दो … मुझे तुम्हारी गांड मारना है शांता … मैं तुम्हारे पैर पड़ता हूँ. पर प्लीज मुझे चोदने दो.”

“साहब साहब आप शान्त हो जाइए. आप इतने बेचैन क्यों हो. आप यहां बैठिए और पानी पीजिए.”

“पानी डाल अपनी गांड में … पर मुझे अभी के अभी चोदने दे.”

“साहब, आप मुझे बताएंगे कि आपको क्या हुआ है?”

“शांता, तुम ही हो जो मेरी मदद कर सकती हो. तुम ही हो जो मेरी भावनाओं को समझ सकती हो. शांता तुम्हें तो पता है कि मैं बिना चुदाई के ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ता रह सकता हूँ. यहां मैंने रचना को एक साल से नहीं चोदा. अगर मैं दो दिन तक और ऐसा ही रहा, तो मैं पागल हो जाऊंगा … प्लीज शांता मेरी मदद करो. शांता मैं सच में पागल हो जाऊंगा. बस मेरे लंड के लिए तू अपनी गांड या चूत का छेद दे दो. रचना मेरी हालत समझ नहीं रही है … तू तो मेरी हालत समझ ले.”

ये कह कर मैं फिर से उसकी गांड और मम्मे दबाने लगा.

शांता बोली- साहब अभी नहीं, आप चिंता मत कीजिए. मैं कल आपके घर आऊंगी. तब तक आप शांत हो जाइए. मैं जरूर आऊंगी.

“पर शांता, मैं कल तक इंतज़ार नहीं कर सकता.”

“साहब प्लीज आप मेरी मजबूरी समझिए. आप अभी यहां से जाइए.”

“तो ठीक है मैं अपने जज्बातों को काबू में रखता हूं, पर कल सुबह मेरी रचना 8 बजे घर से निकलेगी. तुम 9 बजे तक आ जाना. प्लीज देरी मत करना.”

“हां साहब मैं आ जाऊंगी.”

मेरा वहां से जाने का मन नहीं हो रहा था.

मैंने फिर से उसे चूमने की कोशिश की लेकिन उसने मना कर दिया.

मैं रात भर इस कोने से उस कोने तक कीड़ों की तरह रेंग रहा था. बस सुबह 9 बजे का इंतज़ार था.

मुझे रात बहुत लंबी लगने लगी.

मैं मन ही मन में घुट रहा था. इतनी खराब हालत हो गई थी.

बस शांता की गांड, चूत के अलावा कुछ दिख ही नहीं रहा था.

जैसे तैसे रात कट गई.

रचना दिल्ली के लिए निकल गयी.

अब बस मुझे शांता का इंतज़ार था.

दिन के 9 बज गए थे. मैं घड़ी और दरवाजे की तरफ ही घूर रहा था.

घड़ी में 9:10 हो गए और अभी भी शांता नहीं आयी थी.

मैंने उसे कॉल किया लेकिन लग नहीं रहा था. मेरी बेचैनी बढ़ रही थी.

मैंने 10 मिनट बाद फिर से कॉल किया, फिर भी नहीं लगा.

आखिर 9:30 बजे उसका कॉल लगा. वो कहने लगी- साहब, बस अभी निकल ही रही हूँ. मेहमान आए थे.

“शांता जल्दी आ जाओ मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा.”

“हां साहब, मैं आ रही हूँ.”

मैं फिर से उसकी राह देखने लगा.

पूरे 20 मिनट इंतज़ार के बाद मैंने फिर से उसे कॉल किया.

अब मेरा दिमाग गर्म हो गया था.

मैंने उसे गाली देना चालू कर दिया- मादरचोद आ रही है या नहीं … या मैं आऊं वहीं पर. कब से निकल गयी कह रही हो, अब तक नहीं पहुंची?

“साहब ऑटो नहीं मिल रही, पैदल आ रही हूँ.”

“तो फिर भाग कर आ ना … गांड मटका मटका कर क्यों चल रही … जल्दी आ न रंडी … रास्ते से ही चोदते चोदते लाऊं क्या?”

“साहब, बस दस मिनट में पहुंच रही हूँ.”

आखिरकार 10 बजे दरवाजे पर बेल बजी तो मेरी जान में जान आयी.

एक सेकंड की भी देर किए बिना मैंने दरवाजा खोल दिया.

शांता दरवाजे पर अपने पल्लू से पसीना पौंछ रही थी.

मैंने उसके हाथ को पकड़ कर झट से अन्दर खींच लिया, दरवाजे को लॉक कर दिया और सीधा उस पर टूट पड़ा.

उसके पल्लू को उसके सीने से अलग कर दिया और उसकी साड़ी को जोर से खींच कर निकालने लगा.

वो गोल गोल घूम कर साड़ी से अलग हो गई और साड़ी नीचे गिर गयी, उसी के साथ वो भी नीचे गिर गई.

मैंने उसके बालों को पकड़ कर उसे खड़ा कर दिया.

जैसे ही वो खड़ी हुई मैंने उसके पेटीकोट का नाड़ा खींच दिया. उसका पेटीकोट सर्र से नीचे गिर गया.

शांता अब सिर्फ ब्लाउज और चड्डी में मेरे सामने खड़ी थी. वो पसीने से पूरी भीग गयी थी.

पसीने की बूंदें माथे से नीचे गाल पर … गाल से होंठों को चूमते हुए गर्दन पर खिसकती जा रही थीं. फिर गर्दन से उसके ब्लाउज के अन्दर जा रही थीं.

हाय क्या मज़ा उठा रही होंगी अन्दर वो पसीने की बूंदें … यही देखने के लिए मैंने उसका ब्लाउज चीर डाला.

मां कसम एक एक मम्मा इतना बड़ा था कि पूछो मत.

पसीने की बूंदें मम्मों के ऊपर नाच सी रही थीं. उसके काले काले खड़े हुए निप्पल पूरे गीले हुए पड़े थे.

कुछ बूंदें दोनों मम्मों के बीच में से नीचे आ रही थीं और पेट से होकर नाभि में घुस रही थीं.

मैंने एक ही झटके में उसकी चड्डी निकाल दी. पसीने की बूंदों का शासन उधर भी था.

उसकी चूत के आसपास, चूत में … और पीछे की तरफ पीठ को चूमते हुए गांड के छेद में, गोल मटोल गोरे गोरे कूल्हों पर मज़े ले रही थीं.

शांता के जिस्म के हर एक अंग पर पसीने की बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं.

पसीने की चमक से उसके मम्मों की, गांड की और फुद्दी की खूबसूरती बढ़ गयी थी.

मैं इस खूबसूरत दृश्य को देखकर पागल हो गया था.

मैंने झटके में अपने सारे कपड़े निकाल दिए और शांता के बदन के सारे पसीने की बूंदों को चाटने लगा, उसके लाल लाल होंठों का रस पीने लगा, गर्दन को काटते हुए चूमने लगा, उसकी बगल को चाटने लगा, खड़े हुए काले निप्पल को काटने और चूसने लगा, मम्मे को पूरी ताकत से मसलने लगा.

इससे शांता एकदम गर्म हो गयी थी.

मेरे हाथ से मम्मे दबाए जाने से वो दर्द से चिल्ला रही थी- उई साहब जी धीरे … आह आआह आह उम्म धीरे!

मैं और जोर से दबाने लगा.

उसके मम्मे से दूध की फुहार निकलने लगी. दूध की बूंदें और पसीने की बूंदें एक हो रही थीं और उसके जिस्म को चाटने का मज़ा और बढ़ रहा था.

मैं 15 मिनट तक उसके जिस्म का हर एक कोना चाटता रहा था.

फिर मैंने उसकी गांड की दरार को अपने दोनों हाथों से खोला.

चार साल पहले उसकी गांड के छेद को कसकर चोदा था, अपने लौड़े से उसकी गांड का छेद काफी बड़ा बना दिया था. पर अभी यह छेद इतना छोटा दिख रहा था कि मेरी जुबान की नोक भी अन्दर नहीं जा रही थी.

मैंने उसकी गांड को चाट चाट कर साफ कर दिया.

क्या नाजुक और बड़ी गांड थी साली की!

उसके जिस्म का हर एक उतार चढ़ाव आकर्षक था, गर्दन से मम्मों तक का, पीठ से गांड तक का … और पेट से चूत का एकदम परफेक्ट माल थी वो!

मेरा लंड कब से टाइट था.

अब उसकी नंगी गांड और चूत को देखकर मेरा लंड शांता को बेरहमी से चोदने वाला था.

मैं शांता की फिक्र करने के मूड में नहीं था.

पहले ही वो देरी से आयी थी और एक साल से किसी को ना चोदने का गुस्सा उसकी गांड को सहना था.

शांता भी कामुक हो गयी थी. उसे होश नहीं था.

पर जैसे ही मैंने उसके बाल खींचे, वो जोर से चिल्लाई- आआ धीरे साहब!

“शांता गांड को तैयार रख!”

“साहब जी रुकिए … थोड़ा पानी पी लेने दीजिए … मैं धूप में चलकर आयी हूँ, प्यास लगी है.”

“मादरचोद रंडी मेरा मूत पी ले. मैंने कहा था देरी से आने के लिए? अब पानी सीधे गांड फाड़ने के बाद पीना. ये देख … मेरा लंड कैसा भूखा है किसी की गांड को तहस नहस करने के लिए.”

शांता मेरा लंड देख कर डर गयी थी.

वो कुछ बोलने ही वाली थी, उससे पहले मैंने उसकी गांड के छेद पर लंड सैट किया और बिना सोचे समझे एक के बाद एक 13 शॉट पूरे जोर जोर से उसके नाजुक होल में लगा दिए.

मेरा लंड कूल्हों को फाड़ते हुए, छेद को चीरते हुए, गांड की गर्मी को झेलते हुए मुलायम गांड में पूरे अन्दर तक घुस गया था.

शांता दर्द के मारे लंड झेल रही थी. उसके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था- आह स..साह…हब ररु..किएए … मैं मर्रर्रर गईई!

पर मैंने उसकी एक न सुनी, मैं अपना लंड उसकी गांड में पेले जा रहा था.

उसकी गांड की खुशबू सूंघकर और जोश में आ गया था.

गांड की गर्मी में लंड झूम रहा था.

एक साल बाद पिंजरे से आज़ाद होकर वो गांड में फुदक रहा था.

पर उसकी मार झेल कर बेचारी शांता तड़फ रही थी.

उसकी गांड में दर्द इतना ज्यादा हो रहा था कि वो अब जोर जोर से चिल्ला रही थी, रो रही थी- साहब साहब रहम करो … थोड़ी देर रुको … मैं आपके पैर पड़ती हूँ बस 5 मिनट रुको … प्लीज रुको ना.

पर मेरा लंड उसकी एक बात भी नहीं सुन रहा था.

उसकी गांड और पैर कांप रहे थे, वो दर्द से बेहाल हो गयी थी.

मेरे चोदने की तेजी इतनी अधिक थी कि वो नीचे फर्श पर गिर गयी.

लंड निकल गया.

मैं झट से उसके ऊपर चढ़ गया और गांड में लंड घुसेड़ दिया.

लंड अब मक्खन जैसा अन्दर जा रहा था.

मेरा लंड एक सेकण्ड के लिए भी गांड से निकलना नहीं चाहता था. शांता अभी भी दर्द के मारे रोती हुई गुजारिश कर रही थी.

पर जब तक मेरे लंड की प्यास बुझने नहीं वाली थी, तब तक उसकी गांड को मैं चोदता रहने वाला था.

शांता का नाजुक जिस्म मेरे सख्त जिस्म से टकरा रहा था. उसके जिस्म की गर्मी और पसीना मुझे और कामुक कर रहा था.

उसके बड़े बड़े मम्मे फर्श पर घिस रहे थे. उसके मुलायम कूल्हे मेरे जिस्म के नीचे दब रहे थे.

मैं उसकी गर्दन को, पीठ को चूम रहा था. उसकी दर्द भरी आवाज सुनकर मुझे मज़ा आ रहा था.

मेरे धक्के इतनी जोर जोर से उसकी गांड में लग रहे थे कि फट फट की जोर से आवाज गूंज रही थी.

करीब 20 मिनट की दर्दनाक गांड चुदाई के बाद मैंने अपना काला साँप बाहर निकाला.

वो अभी भी शांता की गांड में घुसने के लिए तड़प रहा था.

शांता ने अब चैन की सांस ली.

मैं उसकी गांड को चाटने लगा और उसकी चूत को सहलाने लगा, चूत के दाने को रगड़ने लगा.

फिर मैंने उसकी चूत में धीरे से एक उंगली डाली, फिर 2 डाल दीं और धीरे धीरे अन्दर बाहर करने लगा.

थोड़ी देर में पूरी तेजी से उसकी फुद्दी को हिलाने लगा.

अब शांता इतनी कामुक हो गयी कि वो गांड का दर्द भूल गयी.

मेरे सर को वो अपनी गांड में दबाने लगी.

वो जोर जोर से मादक सिसकारियां लेने लगी- आह आह साहब आआह … उम्म ओह और जोर से और जोर से!

उसकी चूत को मैंने कुछ ही मिनट में पूरा गीला कर दिया था.

अब मेरा लंड फिर से उसकी गांड में जाने के लिए बेताब हो गया था.

मैंने शांता को खड़ा किया.

शांता पूरे होश खो बैठी थी और मेरे पूरे बदन को चूमने लगी थी.

कभी मेरे होंठों को, तो कभी सीने को, कभी मेरी गांड को.

फिर उसने मेरा लंड मुँह में ले लिया और जोर जोर से चूसने लगी.

हाय क्या गजब का मजा आ रहा था- शांता बस कर .. चल तेरी नटखट गांड दिखा.

शांता को मैंने खड़ा किया और गांड में लंड पेल दिया.

थोड़ी देर पहले ‘नहीं नहीं …’ बोलने वाली शांता अब ‘और जोर से … और जोर से चोदो …’ बोल रही थी.

मैं शांता को गाली देने लगा- साली रंडी बड़ी गांड वाली औरत … समय पर क्यों नहीं आयी आज सुबह … मादरचोद साली भैन की लवड़ी.

वो मजे से लंड ले लेकर बस हंस रही थी.

करीब दस मिनट तक गांड मारने के बाद मैंने लंड का माल उसकी गांड में ही छोड़ दिया.

उसके बाद हम दोनों लेट गए.

शांता मुझसे चिपक गई.

कुछ देर बाद हम दोनों के बीच चूत चुदाई का दौर चला.

उस दिन मैंने शांता को चार घंटे में चार बार चोदा.

उसके के बाद वो अपने घर चली गई.

मेरा साल भर का प्यास लंड ठंडा हो गया था.

जब रचना दिल्ली से वापस आई तब उसके साथ मैंने क्या किया, वो आपको अगली बार लिखूँगा.

आपको मेरी Free Sex Kahani कैसी लगी, मेल और कमेंट्स से बताएं.

patilrocky1302@gmail.com

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